परमात्मा कबीर जी का चारों युगों में अवतरित होना
परमात्मा कबीर जी का चारों युगों में अवतरित होना
प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी कबीर साहेब जी का प्राकट्य दिवस बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। इस वर्ष कबीर प्राकट्य दिवस 20, 21 और 22 जून 2024 को मनाया जा रहा है। कबीर प्रकट दिवस परमात्मा कबीर साहेब के धरती पर अवतरित होने के अवसर पर मनाया जाता है। भगवान कबीर साहेब भारत में उत्तर प्रदेश के काशी में लहरतारा तालाब पर एक कमल के फूल पर नवजात शिशु के रूप में सशरीर अवतरित हुए थे। बालक रूप में परमात्मा को नीरू और नीमा नाम की निःसंतान दंपत्ति ने अपने साथ ले जाकर पालन पोषण किया। इसलिए नीरू नीमा कबीर साहेब के मुंह बोले माता - पिता कहलाए। लोकवेद के आधार पर परमात्मा कबीर साहेब को पूरी दुनिया जुलाहा जाति में जन्मे एक संत और कवि ही मानती रही। परंतु कबीर साहेब ही सारी सृष्टि के रचयिता, पालनहार और कुल के मालिक हैं।
आज जगतगुरु संत रामपाल जी महाराज जी ने चारों वेद, गीता जी, कुरान शरीफ, बाइबल और गुरु ग्रंथ साहिब से प्रमाणित कर दिया कि कबीर साहेब जी ही पूर्ण परमात्मा परम अक्षर ब्रह्म हैं, जो अनंत कोटि ब्रह्मांड के स्वामी हैं जो अपने निज धाम सतलोक में कविर्देव के नाम से सशरीर राजा के समान विराजमान हैं।
परमात्मा कबीर साहेब जी स्वयं धरती पर अवतरित होकर एक संत की लीला करते हुए अपनी बनाई हुई सृष्टि की संपूर्ण जानकारी खुद ही देते हैं। वर्तमान में पूर्ण संत जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी ने हमें बताया कि हम किस प्रकार काल के इस 21 ब्रह्मांड में अपनी गलती से आकर फंस गए हैं और कबीर परमात्मा की भक्ति करके ही इस लोक से बाहर निकलकर पूर्ण मोक्ष पा सकते हैं।
आज से लगभग 600 वर्ष पहले कबीर साहेब जी ने धर्मदास जी को ज्ञान उपदेश देते हुए बताया कि प्रथम सतयुग में जब परमात्मा कबीर जी अपने पुत्र जोगजीत के रूप में काल के इस 21 ब्रह्मांड में आए तब काल निरंजन (क्षर ब्रम्ह) ने उन्हें नीचे के लोकों में आने से रोकने के लिए परमात्मा के ऊपर हमला करने की कोशिश की। परंतु परमात्मा की शक्ति के आगे काल निरंजन असहाय होकर जोगजीत रूप में परमात्मा के सामने प्रार्थना करने लगा और उनको वचनबद्ध कर उसने उनसे आशीर्वाद ले लिया कि तीनों युगों में कम जीव आत्माओं को सतलोक ले जाना और जब चौथा युग कलयुग आएगा तब जितने चाहे जीव आप ले जाना लेना। परमात्मा ने तथास्तु कहकर आशीर्वाद दे दिया। इस कारण परमात्मा चारों युगों में आते हैं और तत्वदर्शी संत की भूमिका निभाते हुए अपनी जीव आत्माओं को तत्वज्ञान देते हैं।
चारों युगों में कबीर परमात्मा के अवतरित होने का प्रमाण
कबीर साहेब जी की वाणी है:
सतगुरु पुरुष कबीर हैं, ये चारों युग परमान।
झूठे गुरुवां मर गए, हो गए भूत मसान।।
अर्थात् - सतगुरु रूप में प्रकट कबीर साहेब ही पूर्ण परमात्मा सत पुरुष हैं जो चारों युग में धरती पर अवतरित होते हैं जिसके प्रमाण हमारे सद्ग्रंथों में विद्यमान हैं, परंतु तत्वज्ञानहीन झूठे गुरु शास्त्र विरुद्ध मनमानी साधना कर अपना जीवन नाश कर मर जाते हैं और चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए भूत आदि बन जाते हैं।
सतयुग में सतसुकृत कह टेरा, त्रेता नाम मुनिंदर मेरा।
द्वापर में करुणामय कहाया, कलयुग नाम कबीर धराया।।
कबीर परमात्मा का सतयुग में सत सुकृत नाम से प्रकट होना
पूर्ण परमात्मा कबीर जी अपने विधान के अनुसार चारों युगों में सशरीर आते हैं। सतयुग में कबीर जी सत सुकृत नाम से एक नवजात शिशु के रूप में कमल के फूल पर अवतरित होकर एक निःसंतान ब्राह्मण दंपत्ति विद्याधर और दीपिका को मिले। ब्राह्मण दंपत्ति शिशु रूप प्राप्त परमात्मा को भगवान शिव जी का दिया हुआ जान अपने घर ले आए और किसी अन्य ब्राह्मण से शिशु का नामकरण करवाया। उस ब्राह्मण ने कबीर साहेब का नाम सत सुकृत रखा। परमात्मा के आशीर्वाद से कुंवारी गाय दूध देने लगीं जिससे शिशु रूप में उनकी परवरिश हुई। जब गुरुकुल में भगवान सत सुकृत जी का प्रवेश हुआ तब शिक्षा के दौरान जब ऋषि कोई वेद मंत्र भूल जाते थे तब परमात्मा सत सुकृत उन वेद मंत्रों को बताया करते थे और जब गुरुकुल के ऋषि किसी वेद मंत्रों का अर्थ गलत बताते थे तब परमात्मा बालक रूप में ही उसका विरोध कर सही अर्थ बताया करते थे, जिसके कारण उनको गुरुकुल से निकाल दिया गया। सत सुकृत रूप में परमात्मा ने अपनी बाल्यावस्था में ही बड़े- बड़े ऋषि मुनियों और विद्वानों को ज्ञान चर्चा में परास्त कर दिया। सतयुग में ही परमेश्वर कबीर जी ने महर्षि मनु से वेद ज्ञान पर चर्चा की, इस शास्त्रार्थ में मनु जी पराजित हुए और परमात्मा को विपरीत ज्ञान देने वाला कहकर उनका नाम वामदेव रख दिया। इसलिए सतयुग में कबीर साहेब जी को वामदेव के नाम से भी जाना जाता है। शिव महापुराण में इसका उल्लेख मिलता है।
परमेश्वर कबीर जी का त्रेता में मुनींद्र मुनि के रूप में अवतरण
प्रत्येक युग की तरह ही प्रभु कविर्देव जी त्रेता युग में भी शिशु रूप में अवतरित होकर एक निःसंतान दंपत्ति ऋषि वेदविज्ञ और साध्वी सूर्या को मिले। त्रेता में परमात्मा का नाम मुनींद्र रखा गया। कुंवारी गाय के दूध से परमात्मा का पालन पोषण हुआ। बाल्य काल से ही परमात्मा अपनी वाणियों के माध्यम से तत्वज्ञान दिया करते थे, परंतु अज्ञानतावश जगत के लोग उन्हें सिर्फ कवि के रूप में ही जानकर उन्हें एक कवि की उपाधि दे देते थे। त्रेता युग में परमात्मा मुनींद्र जी ने नल-नील नाम के दो भाइयों को अपनी शरण में लिया। उनके असाध्य रोग जिसे सभी वैद्यों, ऋषि मुनियों,आचार्यों आदि ने कर्म का फल बताकर कहा था कि यह कष्ट तो भोगने से समाप्त होगा, उस कष्ट को प्रभु मुनींद्र जी ने अपने आशीर्वाद से ही दूर कर दिया था और उनको वरदान दिया कि उनके हाथों से कोई भी वस्तु पानी में नहीं डूबेगी। इस वरदान के कारण जब श्रीराम माता सीता को वापस लाने के लिए लंका जा रहे थे तब समुद्र देव के बताए अनुसार नल नील को समुद्र पर सेतु निर्माण के लिए कहा गया, परंतु वे दोनों मान बड़ाई और अहंकारवश अपने गुरु प्रभु मुनींद्र जी को भूल गए।
जिसके कारण उनके हाथों से वह शक्ति हमेशा के लिए समाप्त हो गई। तद उपरांत प्रभु मुनींद्र जी वहां स्वयं प्रकट हुए और श्रीराम की प्रार्थना करने पर एक छड़ी से वहां स्थित पर्वत के चारों तरफ घेरा बना दिया और कहा कि मैंने अपने आशीर्वाद से इन पत्थरों को हल्का कर दिया है, इन पत्थरों से सेतु का निर्माण कर लो। चूंकि नल और नील राजमिस्त्री थे इसलिए उन्होंने उन पत्थरों को छैनी हथौड़ी से आकार देकर आपस में जोड़ने का कार्य किया। इसी कारण लोकवेद में यह प्रचलित हो गया कि समुद्र पर पुल नल नील ने बनाया था। परंतु यह सर्वथा एक मिथ्या थी। समुद्र पर सेतु का निर्माण कर परमेश्वर कबीर साहेब जी ने प्रथम सतयुग में काल ब्रह्म(ज्योति निरंजन) को दिए अपने वचन को भी पूरा किया। त्रेता युग में ही परमात्मा कविर्देव ने मुनींद्र जी के रूप में रावण की पत्नी मंदोदरी और भाई विभीषण को भी अपनी शरण में लेकर उनका कल्याण किया। लंका से सीता जी को अयोध्या वापस लाने के पश्चात एक दिन सीता के द्वारा हनुमान जी का अपमान होने के कारण हनुमान ने अपने प्रभु श्रीराम का त्याग कर दिया था। इसके बाद परमेश्वर मुनींद्र जी ने हनुमान को भी अपनी शरण में लेकर तत्वज्ञान दिया। तब हनुमान जी ने श्रीराम की भक्ति छोड़कर अविनाशी राम (परम अक्षर ब्रह्म) की भक्ति प्रारंभ की और प्रभु मुनींद्र जी से मोक्ष मंत्र प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त किया।
द्वापर युग में प्रभु कविर्देव ने करुणामय नाम से लीला की
द्वापर युग को मुख्यतः महाभारत के युद्ध और विष्णु अवतार श्री कृष्ण की लीलाओं के लिए जाना जाता है। परंतु इन सभी लोकवेद और दंत कथाओं के बीच पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी के अवतार करुणामय जी की वास्तविक कथाओं और लीला से हम अनभिज्ञ रह गए। सतयुग और त्रेता की तरह द्वापर युग में भी परम पिता परमेश्वर कविर्देव जी रामनगर नामक नगरी के एक सरोवर में कमल के फूल के ऊपर शिशु रूप में अवतरित हुए। शिशु रूप में परमात्मा को एक निःसंतान वाल्मीकि दंपत्ति (कालू और गोदावरी) अपने साथ घर ले गए। परमात्मा के इस लीलामय बाल्य शरीर की परवरिश कुंवारी गाय के दूध से हुई। उसी समय एक ऋषि के द्वारा परमात्मा का नाम करुणामय रखा गया। करुणामय रूप में भी प्रभु कविरदेव जी ने अपने तत्वज्ञान का प्रचार करते हुए अनेक लीलाएं की। उन लीलाओं में निम्नलिखित लीलाएं प्रमुख हैं -
द्रौपदी को चीरहरण से बचाना- जब कौरवों की सभा में पांडवों के सामने द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था, तब किसी ने भी द्रौपदी की रक्षा नहीं की। द्रौपदी ने श्री कृष्ण को याद किया लेकिन कृष्ण तो इस समय अपनी पटरानी रूखमणी के साथ शतरंज खेलने में व्यस्त थे। तब परमात्मा कबीर साहेब जी ने ही वहां सूक्ष्म रूप में उपस्थित होकर द्रौपदी का चीर बढ़ाया और उसकी लाज बचाई। परमात्मा कबीर साहेब द्रौपदी के साथ भविष्य में होने वाली इस अनिष्ट घटना से परिचित थे इसलिए उन्होंने वर्षों पहले विवाह से पूर्व ही द्रौपदी से एक पुण्य कर्म करवा लिया था, जिसमें परमात्मा ने एक नेत्रहीन साधु की लीला की। उस नेत्रहीन साधु का वस्त्र नहाते वक्त पानी में बह गया था, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा उस साधु को देकर उनकी लाज बचाई थी। उस साधु के आशीर्वाद के फलस्वरूप ही द्रौपदी का चीर इतना बढ़ गया कि भरी सभा में उसकी लाज बच गई।
पांडवों को ऋषि दुर्वासा के श्राप से बचाने के लिए ऋषि और उनके शिष्यों को भोजन कराना - पांडवों के वनवास के दौरान कौरवों ने ऋषि दुर्वासा और उनके शिष्यों को पांडवों के यहां भोजन करने की प्रार्थना की ताकि दुर्वासा ऋषि क्रोधित होकर पांडवों को श्राप दें। जब दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ पांडवों के पास आए तब तक द्रौपदी पांडवों को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन कर चुकी थी, इसलिए द्रौपदी के अक्षय पात्र से अब और भोजन उत्पन्न होना संभव नहीं था। ऐसी विकट परिस्थिति में परमात्मा कविर्देव जी स्वयं श्रीकृष्ण का रूप धारण कर पांडवों के पास आए और द्रौपदी की रसोई में जाकर खाना बनाने के पात्र से अन्न का एक कण ग्रहण किया। पूर्ण ब्रह्म कबीर साहेब जी को अन्न का एक कण दान देने के पुण्य का फल इतना मिला कि दुर्वासा और उनके दस हजार शिष्यों का पेट भर गया। इस तरह परमात्मा ने पांडवों को दुर्वासा के श्राप से बचा लिया।
महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों का यज्ञ संपन्न कर उनको पाप से मुक्त करना -
महाभारत युद्ध में लाखों लोगों की हत्या के कारण युधिष्ठिर को तीन ताप सताने लगे। नींद में युधिष्ठिर को बुरे सपने, विधवाओं की चीख पुकार सुनाई देने लगी जिससे युधिष्ठिर बहुत ही व्याकुल हो गए। तब पांडवों के आध्यात्मिक गुरु श्रीकृष्ण ने पांडवों से अश्वमेघ यज्ञ करने को कहा। उस यज्ञ में एक पंचानन शंख रखा गया, जिसके बजने के बाद ही यज्ञ सफल होता और युधिष्ठिर की समस्या का समाधान भी होता। परंतु यज्ञ में उपस्थित 33 करोड़ देवी देवता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, 88 हजार ब्राह्मण, यादव आदि के भोजन ग्रहण करने के बाद भी शंख नही बजा। श्रीकृष्ण के आदेश से भक्त सुपच सुदर्शन जो कि परमात्मा करुणामय जी के शिष्य थे, को भी निमंत्रण भेजा गया था, परंतु सुपच सुदर्शन जी ने पांडवों के पाप का भोजन स्वीकार करने से मना कर दिया था और अपनी कुटिया को छोड़ तीर्थ यात्रा में निकल गए। प्रभु कबीर साहेब जी लीला करते हुए अपने शिष्य सुपच सुदर्शन का रूप धारण कर कृष्ण और पांडवों के साथ यज्ञ में शामिल हुए। सुदर्शन रूप में परमात्मा को देख वहां उपस्थित ऋषि मुनि, देवता, ब्राह्मण आदि सभी ने उपहास उड़ाते हुए यह शंका जाहिर की कि इस शूद्र से शंख क्या बजेगा? परंतु वहां उपस्थित श्रीकृष्ण पूरी तरह आश्वस्त थे कि शंख इन्ही महात्मा जी से ही बजेगा। सुदर्शन रूप में परमात्मा ने जब द्रौपदी के द्वारा बनाए सभी पकवानों को एक साथ मिलाया तो द्रौपदी के मन में दोष आया कि इस शूद्र से शंख नहीं बजेगा। परंतु परमात्मा के पांच ग्रास भोजन ग्रहण करते ही शंख पांच बार बजा और बजना बंद हो गया।
तब श्रीकृष्ण ने कहा कि शंख को बिना रुके लगातार बजना चाहिए तभी यज्ञ सफल माना जाएगा। कृष्ण समझ गए कि द्रौपदी के मन में कोई दोष आ गया। फिर कृष्ण जी के कहने पर द्रौपदी और कृष्ण दोनों ने सुदर्शन रूप में परमात्मा के चरण धोकर पिए तब पंचायन शंख तेज ध्वनि के साथ बजने लगा। शंख की आवाज पूरे ब्रह्मांड में गुंजायमान हुई। पूरी धरती हरी भरी हो गई। इस प्रकार परमेश्वर कबीर साहेब जी ने सुदर्शन रूप में अपने आशीर्वाद से पांडवों के पाप कर्म का नाश कर यज्ञ को सफल किया।
कलयुग में अपने वास्तविक नाम कबीर के रूप में अवतरित परमात्मा ने जीवों का उद्धार किया
पूर्व वर्णित तीनों युगों कि तरह ही कलयुग में भी परम पिता कबीर साहेब जी अपने निज धाम सतलोक से सशरीर बालक रूप में आकर काशी के लहरतारा नामक तालाब में कमल के फूल पर विराजमान हुए और निःसंतान दंपत्ति नीरू-नीमा को मिले। परमात्मा जब शिशु रूप में लीला कर रहे थे तब उनका रूप इतना मनमोहक था कि दूर- दूर से लोग उन्हें देखने के लिए आते थे। कोई उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश का अवतार बताते तो कोई अन्य देवता बताता। 25 दिन तक जब शिशु रूप में परमात्मा ने कोई आहार ग्रहण नहीं किया तब परमात्मा कबीर जी की ही प्रेरणा से शंकर जी ने आकर नीरू-नीमा को बताया कि इस असाधारण दिव्य बालक को कुंवारी गाय का दूध पिलाओ जिससे इनकी परवरिश होगी। कबीर साहेब जी 3 वर्ष की आयु से ही अपने तत्वज्ञान से बड़े- बड़े विद्वानों के छक्के छुड़ा दिए।
पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी कलयुग में अपने लीलामयी शरीर में 120 वर्ष रहे और अनेकों लीलाएं करते हुए अपने पुण्य आत्माओं को तत्वज्ञान देकर काल के इस लोक से मुक्ति दिलाई। कबीर साहेब जी की निम्नलिखित लीलाएं सर्वविदित हैं -
मृत कमाल और कमाली को जीवित करना।
दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी के असाध्य रोग को ठीक करना।
रामानंद जी, धर्मदास जी को सतलोक दिखाकर लाना।
अपने मुँहबोले गुरु रामानंद जी को पुनर्जीवित करना।
सेऊ के धड़ से अलग हुए सिर को जोड़कर नया जीवन प्रदान करना तथा गरीब सम्मन को अपने आशीर्वाद से धनी सेठ बनाना।
तैमूर लंग को 7 पीढ़ी तक राज का आशीर्वाद देना।
गोरखनाथ को सिद्धि में परस्त कर अपनी शरण में लेना।
काशी में 18 लाख लोगों को 3 दिन तक भंडारा कराना।
120 वर्ष की लीला का अंत करते हुए मगहर से परमात्मा सशरीर सतलोक चले गए, उनके शरीर के स्थान पर सुगंधित फूल रखे हुए मिले।
परमात्मा सतलोक गमन करने के बाद भी समय समय पर कई पुण्य आत्माओं को अपना तत्वज्ञान देने धरती पर अवतरित होते रहे। कबीर साहेब जिन जिन महापुरुषों को मिले उनमें मलूकदास, घीसा दास, गरीबदास, नानक देव प्रमुख हैं।
धर्म दास जी को ज्ञान देते हुए परमेश्वर कबीर जी ने कहा था कि जब कलयुग 5505 वर्ष बीत जायेगा तब 12 वें पंथ में हम स्वयं एक बार फिर आयेंगे और काल के सभी पंथों को मिटाकर एक पंथ चलाएंगे। परमात्मा के वचनानुसार वर्तमान में कबीर साहेब स्वयं तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के रूप में इस धरा पर अवतरित हैं, जो हम सभी जीवों के उद्धार के लिए पुनः 600 वर्ष पहले की लीला को दोहरा रहे हैं। आज पूरे विश्व में परमेश्वर स्वरूप संत रामपाल जी महाराज जी के आध्यात्मिक ज्ञान का डंका बज चुका है। उनके लाखों अनुयाई संत जी से सतनाम, सारनाम और सारशब्द प्राप्त कर अपना कल्याण करा रहे हैं।
इस वर्ष 20 जून से 22 जून 2024 तक, जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के सानिध्य में 627वें कबीर प्रकट दिवस के अवसर पर एक विशेष समागम का आयोजन किया जा रहा है। इस समागम पर आयोजित किए जाने वाले विशेष कार्यक्रम कुछ इस प्रकार है:
निःशुल्क भंडारा: सभी आगंतुकों के लिए 20 से 22 जून 2024 तक निःशुल्क भंडारे का आयोजन होगा।
निःशुल्क नाम दीक्षा: इस अद्वितीय अवसर पर संत रामपाल जी महाराज से निःशुल्क नाम दीक्षा प्राप्त की जा सकती हैं।
3 दिवसीय अखंड पाठ: 20 से 22 फरवरी 2024 तक, 3 दिनों तक अखंड पाठ का आयोजन होगा।
रक्तदान शिविर, निशुल्क नेत्र व दांतो की जांच, दहेज मुक्त विवाह और आध्यात्मिक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया है।
विशेष सत्संग प्रसारण: 22 जून 2024 को संत रामपाल जी महाराज के सत्संग का विशेष प्रसारण साधना टीवी चैनल पर सुबह 9:15 बजे (IST) से होगा।
* सोशल मीडिया प्रसारण: इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण निम्नलिखित सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों पर भी उपलब्ध होगा:
Facebook page:- Spiritual Leader Saint Rampal Ji
YouTube:- Sant Rampal Ji Maharaj
Twitter:- @SaintRampalJiM
आप सभी इस महान अवसर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करें और इस आध्यात्मिक आयोजन का लाभ उठाएं। वहीं इस कार्यक्रम में आने के लिए आप निम्न सतलोक आश्रम में आ सकते हैं:
1. सतलोक आश्रम धनाना धाम, सोनीपत, हरियाणा
2. सतलोक आश्रम मुंडका, दिल्ली
3. सतलोक आश्रम धूरी, पंजाब
4. सतलोक आश्रम खमाणो, पंजाब
5. सतलोक आश्रम सोजत, राजस्थान
6. सतलोक आश्रम शामली, उत्तर प्रदेश
7. सतलोक आश्रम कुरुक्षेत्र, हरियाणा
8. सतलोक आश्रम भिवानी, हरियाणा
9. सतलोक आश्रम बैतूल, मध्य प्रदेश
10. सतलोक आश्रम इंदौर, मध्य प्रदेश
11. सतलोक आश्रम धनुषा, नेपाल
संत रामपाल जी महाराज जी से निःशुल्क नाम दीक्षा लेने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें ⬇️
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