आख़िर क्यों पूर्ण परमेश्वर कबीर साहेब ने गुरु बनाया और क्या है इसके पीछे की कहानी?
आख़िर क्यों पूर्ण परमेश्वर कबीर साहेब ने गुरु बनाया और क्या है इसके पीछे की कहानी?
बिना गुरु के जीव मोक्ष प्राप्ति नहीं कर सकता। आज हम बताएंगे कि किस प्रकार कबीर प्रभु ने गुरु परम्परा बनाए रखने के लिए गुरु बनाने की लीला की। जब पूर्णब्रह्म कविर्देव (कबीर परमेश्वर जी) अपनी लीलामय शरीर में लगभग 5 वर्ष की उम्र की लीला कर रहे थे, तब गुरु परम्परा बनाए रखने के लिए ताकि आने वाले समय में कोई भी यह ना सोचे कि, "कबीर परमात्मा जी ने कहां गुरु बनाए थे, हमें गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है!" इस शंका के निवारण के लिए गुरु बनाने की लीला की।
रामानंद जी बहुत बड़े विद्वान माने जाते थे
जब परमेश्वर कबीर जी अपना तत्वज्ञान बताने के लिए पृथ्वी पर आए हुए थे। उस समय काशी में आदरणीय रामानंद जी बहुत बड़े विद्वान माने जाते थे। उनके 1400 ऋषि शिष्य थे, जो वैष्णव पंथ का प्रचार पूरे भारतवर्ष में करते थे और दिन भर में 52 दरबार (सभाएँ) लगाते थे। परमेश्वर कबीर जी इसीलिए भी उन्हें गुरु बनाना चाहते थे कि अगर इतना बड़ा प्रकांड विद्वान और प्रसिद्ध गुरु यदि परमात्मा का तत्वज्ञान समझ जाए, तो संसार को समझाने में आसानी हो जाएगी। इसीलिए परमेश्वर कबीर जी रामानंद जी को अपना गुरु बनाना चाहते थे।
गंगा घाट पर स्वामी रामानन्द जी की बालक कबीर से भेंट
सुबह ब्रह्ममुहूर्त में आदरणीय रामानंद जी रोज की तरह स्नान करने जाया करते थे। ऐसे ही एक दिन सुबह का समय था, अंधेरा हो रहा था, परमेश्वर कबीर जी ढाई वर्ष की आयु के बालक के रूप में पंचगंगा घाट पर जाकर सीढ़ियों में लेट गए। रामानंद जी स्नान करने के लिए आ ही रहे थे, पंचगंगा घाट की सीढ़ियों से उतरते वक्त कबीर परमेश्वर जी के रामानंद जी की खड़ाऊ सिर पर लग गई। परमेश्वर कबीर जी रोने लग गए। उसी दौरान झुकने पर रामानंद जी के गले से एक माला निकल कर परमेश्वर कबीर जी के गले में गिर गई। आदरणीय रामानंद जी ने बालक रूप में लेटे कबीर प्रभु के सिर पर हाथ रख कर रोते हुए कबीर जी को चुप कराने के उद्देश्य से कहा, "बेटा राम राम बोल, राम के नाम से तो दुख भी दूर होते हैं!" रामानंद जी सोचने लगे कि यह बालक अपने घर का रास्ता भूल गया है और गलती से यहां आ गया होगा। स्नान करने के पश्चात इसे अपने आश्रम ले चलता हूं, सुबह होने पर जिसका बच्चा होगा, उसके घर पहुंचा दूंगा। इतना सोचकर रामानंद जी स्नान करने चले गए। इधर परमेश्वर कबीर जी अंतर्ध्यान हो गए और अपने मुँहबोले माता-पिता नीरू नीमा के पास बालक रूप में सो गए।
कबीर जी द्वारा विवेकानंद जी के अधूरे ज्ञान की पोल खोलना
परमेश्वर कबीर जी 5 वर्ष की आयु में ही बड़े-बड़े विद्वानों के छक्के छुड़ा दिया करते थे। एक बार महर्षि रामानंद जी के शिष्य श्री विवेकानन्द जी कहीं पर श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे। उस सभा में वह विष्णु जी को अजर अमर बता रहे थे। उस सभा में 5 वर्षीय बालक रूप में परमेश्वर कबीर जी ने प्रश्न किया कि, "एक बार मैंने देवी भागवत महापुराण की कथा सुनी थी, उसमें विष्णु जी कह रहे थे, अपनी माता दुर्गा से कि, मैं (विष्णु), ब्रह्मा, और शंकर हमारा आविर्भाव और तिरोभाव होता है। स्वामी जी आप विष्णु जी को अजरो अमर बता रहे हो, ये तो नाशवान हैं।" विवेकानंद जी ने देवीभागवत तुरन्त खोली, प्रमाण ज्यों का त्यों मिला। अपनी बेइज्जती होता देख, बात को घुमाते हुए विवेकानंद जी ने कहा, "तेरा गुरु कौन है?" कबीर परमेश्वर जी ने कहा, "जो आपके गुरु जी हैं, वही मेरे भी गुरु जी हैं।" विवेकानंद जी बोले, "मेरे गुरुदेव पता है कौन हैं? श्री श्री 1008 रामानंद जी महाराज मेरे गुरु हैं!"
कबीर परमात्मा ने कहा,
"वही मेरे गुरु जी हैं।"
नीरू नीमा जुलाहे का पुत्र कबीर झूठा है
विवेकानंद जी ने पूछा, "तू कौन बालक है, किसका तू पुत्र है, क्या तेरी जाति है?" परमेश्वर कबीर जी के बोलने से पहले श्रोताओं ने बताया कि, "ये नीरू नीमा जुलाहे का पुत्र है, इसका नाम कबीर है।" विवेकानंद जी ने कहा, "देखा श्रोताओं, कितना झूठा है ये, मेरे गुरु इन अछूतों को देखते भी नहीं और ये बड़ी-बड़ी डींगे मार रहा है, ये रामानंद जी को गुरु मानता है। कल देखना इसकी पिटाई होगी, गुरु जी के सामने इसकी शिकायत करूँगा, वहां तुम सब भी आना, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।" इतना कहकर विवेकानंद जी रामानंद जी को सर्व विवरण सुनाते हैं और रामानंद जी अगले दिन सुबह-सुबह कबीर प्रभु को पकड़ कर लाने का आदेश देते हैं।
बालक कबीर को रामानन्द जी के सामने प्रस्तुत करना
अगले दिन दस ब्राह्मण कबीर प्रभु को पकड़ने के लिए जाते हैं और कबीर परमात्मा के माता-पिता को पीटते हैं और उनकी कुटिया में तोड़-फोड़ करके कबीर परमात्मा को पकड़ कर रामानंद जी के आश्रम में ले आते हैं। रामानंद जी ने लोगों को यह दिखाने के लिए कि मैं शूद्रों के दर्शन भी नहीं करता, क्या मैं इस कबीर को शिष्य बना सकता हूं? यह बताने के लिए अपनी कुटिया में एक पर्दा लगा लेते हैं ताकि कबीर प्रभु को रामानंद जी देख भी न पाएं और सारी बात स्पष्ट हो जाए। उन दस ब्राह्मणों ने कबीर प्रभु को रामानंद जी के आश्रम में पर्दे के आगे लाकर खड़ा कर दिया। पर्दे के पीछे से रामानंद जी बहुत गुस्से में आकर कहते हैं, "हे दुष्ट बालक! तू कौन है? तेरी क्या जाति है?" कबीर प्रभु बड़े ही अधीन भाव से गुरु-शिष्य की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए जवाब देते हैं, "गुरुदेव! आपके कटु वचन मुझे बहुत प्यारे लग रहे हैं। स्वामी जी, मैं पूर्ण ब्रह्म हूँ, जाति मेरी जगत गुरु है, मैं सबको तत्वज्ञान समझाने आता हूँ, मैं परमेश्वर हूँ, सर्व सृष्टि मैंने ही रची है।
" रामानंद जी बोले, "रे दुर्बुद्धि बालक, मुसलमानों के टुकड़े पर पल रहा है, और अपने आप को परमात्मा कहता है।"
न जाने परमेश्वर किस रूप में आ जाए
रामानंद जी के मन में कुछ संदेह हुआ कि, न जाने परमेश्वर किस रूप में आ जाए, इस बालक से बाद में बात करता हूँ, पहले अपना नित्य कर्म, पूजा, साधना कर लेता हूँ। रामानंद जी मानसिक कल्पनाओं के साथ पूजा करते थे, कोई मूर्ति वगेरह को नहीं पूजते थे, सिर्फ मानसिक ध्यान में पूजा करते थे। रामानंद जी अपने अभ्यास अनुसार साधना करने लगे, कृष्ण जी को मानसिक कल्पनाओं के आधार पर नहलाया, मुकुट पहना दिया, कंठी डालना भूल गए। यदि कंठी नहीं डाली तो पूजा खण्डित मानी जाती है, रामानंद बहुत दुखी हो रहे थे। सामने कोई मूर्ति वगेरह नहीं होती, मानसिक कल्पना कर रहे थे। इतने में पूर्ण ब्रह्म कविर्देव कबीर परमेश्वर जी कह रहे हैं, "स्वामी जी, कंठी की गाँठ खोल दो, मुकुट उतारना नहीं पड़ेगा, पूजा खण्डित नहीं होगी।" स्वामी जी की तुरन्त आँख खुल गई। मन में सोचा कि, कबीर कोई आम इंसान नहीं है, मेरे मन की कल्पना बता दी। तुरन्त सामने पर्दा हटाया और कबीर प्रभु को गले से लगा लिया। सारे पंडित और श्रद्धालु वहां से चले गए कि रामानंद जी का तो बुढ़ापे में दिमाग चल गया। जैसे ही रामानंद जी ने कबीर प्रभु को गले लगाया, परमेश्वर कबीर जी का शरीर हाड़-मांस से बना हुआ नहीं था, नूरी शरीर था, बिल्कुल कोमल रुई जैसा शरीर था।
ये कोई साधारण बालक नहीं
रामानंद जी ने कहा, "कबीर जी, आपने मुझसे झूठ क्यों बोला?" कबीर प्रभु ने पूछा, "कैसा झूठ?" रामानंद जी ने कहा, "आपने कहा कि, आपने मुझे गुरु बनाया, मैं तो अछूत को दीक्षा देता ही नहीं हूँ, तो आपने मुझे कैसे गुरु बनाया?" परमेश्वर कबीर जी ने रामानंद जी को पंचगंगा घाट पर ढाई वर्ष के बच्चे वाली घटना याद दिलाई। रामानंद जी कहने लगे, "वो तो छोटा सा बालक था?" कबीर प्रभु ने ढाई वर्ष के बच्चे का रूप बनाकर पास में रखी सेवक की चारपाई पर लेट गए और पाँच वर्ष के बच्चे के स्वरूप में भी खड़े रहे। स्वामी रामानंद जी ने छह बार दोनों तरफ आंखें मल-मल कर देखा। फिर ढाई वर्ष वाले बच्चे का शरीर पाँच वर्ष वाले कबीर प्रभु के शरीर में समा गया। स्वामी रामानंद जी ने सोचा, ये कोई साधारण बालक नहीं है।
कबीर प्रभु ने सम्पूर्ण तत्वज्ञान रामानंद जी को समझाया
रामानंद जी बोले, "मैं दीक्षा में राम नाम तो नहीं देता?" कबीर प्रभु ने कहा, "आप दीक्षा में ओम नाम जाप देते हो!" रामानंद जी आश्चर्यचकित हुए, फिर दोबारा पूछा, "मैं दीक्षा के साथ-साथ एक कंठी माला भी देता हूँ?" कबीर प्रभु ने जेब में से माला निकाल कर दी और बोले, "यह कंठी उस दिन आपने ही तो डाली थी मेरे गले में!" रामानंद जी मान गए कि, ये बालक तो नहीं है, यह बहुत विशेष शक्ति है। फिर कबीर प्रभु ने सम्पूर्ण तत्वज्ञान रामानंद जी को समझाया और ऊपर के लोक दिखाए और अपनी राजधानी सतलोक दिखाकर वापस छोड़ा। तब रामानंद जी ने माना कि कबीर साहेब पूर्ण ब्रह्म हैं।
वास्तव में कौन किसका गुरु
परमेश्वर कबीर जी की सम्पूर्ण वास्तविकता जानने के बाद रामानंद जी ने कहा, "मैं कैसे आपका गुरु बनूंगा?" परमेश्वर ने कहा, "गुरु परम्परा बनाए रखने के लिए आप मेरे गुरु बने रहो, लेकिन जैसे भक्ति मैं बताऊँ वैसे करते रहो।"
इस प्रकार कबीर प्रभु ने रामानंद जी को तत्वज्ञान से परिचित भी करवाया और फिर पूर्ण मोक्ष का मार्ग भी बताया। गुरु रामानंद जी रहे, लेकिन कबीर प्रभु ने शिष्य बनकर रामानंद जी का उद्धार किया।
परमेश्वर से प्राप्त दिव्य तत्वज्ञान के आधार पर आदरणीय गरीब दास जी कहते हैं:
"गरीब, रामानंद से लख गुरु, तारे शिष्य के भाए।
चेलों की गिनती नहीं, पद में रहे समाए।।"
कबीर प्रभु ने रामानंद जी जैसी लाखों आत्माओं को गुरु बनाकर यानी उनका शिष्य बनकर पार किया और जो कबीर प्रभु की शरण में आकर शिष्य बनकर मर्यादा में रहकर भक्ति करते रहे, उनकी तो गिनती नहीं, कितने ही पार कर दिए गए।
इस वर्ष 20 जून से 22 जून 2024 तक, जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के सानिध्य में 627वें कबीर प्रकट दिवस के अवसर पर एक विशेष समागम का आयोजन किया जा रहा है। इस समागम पर आयोजित किए जाने वाले विशेष कार्यक्रम कुछ इस प्रकार है:
* निःशुल्क भंडारा: सभी आगंतुकों के लिए 20 से 22 जून 2024 तक निःशुल्क भंडारे का आयोजन होगा।
* निःशुल्क नाम दीक्षा: इस अद्वितीय अवसर पर संत रामपाल जी महाराज से निःशुल्क नाम दीक्षा प्राप्त की जा सकती हैं।
* 3 दिवसीय अखंड पाठ: 20 से 22 फरवरी 2024 तक, 3 दिनों तक अखंड पाठ का आयोजन होगा।
* रक्तदान शिविर, निशुल्क नेत्र व दांतो की जांच, दहेज मुक्त विवाह और आध्यात्मिक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया है।
* विशेष सत्संग प्रसारण: 22 जून 2024 को संत रामपाल जी महाराज के सत्संग का विशेष प्रसारण साधना टीवी चैनल पर सुबह 9:15 बजे (IST) से होगा।
* सोशल मीडिया प्रसारण: इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण निम्नलिखित सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों पर भी उपलब्ध होगा:
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Twitter:- @SaintRampalJiM
आप सभी इस महान अवसर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करें और इस आध्यात्मिक आयोजन का लाभ उठाएं। वहीं इस कार्यक्रम में आने के लिए आप निम्न सतलोक आश्रम में आ सकते हैं:
1. सतलोक आश्रम धनाना धाम, सोनीपत, हरियाणा
2. सतलोक आश्रम मुंडका, दिल्ली
3. सतलोक आश्रम धूरी, पंजाब
4. सतलोक आश्रम खमाणो, पंजाब
5. सतलोक आश्रम सोजत, राजस्थान
6. सतलोक आश्रम शामली, उत्तर प्रदेश
7. सतलोक आश्रम कुरुक्षेत्र, हरियाणा
8. सतलोक आश्रम भिवानी, हरियाणा
9. सतलोक आश्रम बैतूल, मध्य प्रदेश
10. सतलोक आश्रम इंदौर, मध्य प्रदेश
11. सतलोक आश्रम धनुषा, नेपाल
संत रामपाल जी महाराज जी से निःशुल्क नाम दीक्षा लेने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें ⬇️
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