627वां कबीर प्रकट दिवस
वर्ष 2024 में, 627वां कबीर प्रकट दिवस 22 जून को पूरे विश्व में मनाया जा रहा है। सन 1398 में कबीर परमेश्वर, इसी दिन काशी में लहरतारा तालाब पर कमल के फूल पर प्रकट हुए थे। आइए जानते हैं परमात्मा कबीर साहेब के विषय में।
कबीर साहेब कौन हैं?
आमतौर पर कबीर साहेब जिन्हें केवल संत या भक्त कवि कहा जाता है वह स्वयं पूर्ण परमात्मा है। ऐसा वेदों में वर्णित है। वेदों में कबीर नाम कविरदेव से वर्णित है। यजुर्वेद अध्याय 29 मन्त्र 25, ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 96 मन्त्र 17, ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 96 मन्त्र 18, ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 1 मन्त्र 9 गवाही देते हैं कि पूर्ण परमात्मा सशरीर है और उसका नाम कबीर है। कबीर साहेब सत्यलोक से स्वयं चलकर आते हैं और कमल के पुष्प पर विराजमान होकर शिशु रूप में प्रकट होकर लीला करते हैं। उनका जन्म माता से नहीं होता। कुंवारी गायों के दूध से उनका पालन पोषण होता है तथा तत्वज्ञान का प्रचार वे लोकोक्तियों और दोहों के माध्यम से करने के कारण लोगों के बीच कवि की उपाधि धारण करते हैं।
परमात्मा कबीर की जीवनी
परमात्मा कबीर जनसाधारण में सामान्यतः "कबीर दास" नाम से जाने जाते थे तथा बनारस (काशी, उत्तर प्रदेश) में जुलाहे की भूमिका कर रहे थे। विडंबना है कि सर्व सृष्टि के रचनहार, भगवान स्वयं धरती पर अवतरित हुए और स्वयं को दास सम्बोधित किया। कबीर साहेब के वास्तविक रूप से सभी अनजान थे सिवाय उनके जिन्हें कबीर साहेब ने स्वयं दर्शन दिए और अपनी वास्तविक स्थिति से परिचित कराया जिनमें नानक देव जी (तलवंडी, पंजाब), आदरणीय धर्मदास जी ( बांधवगढ़, मध्यप्रदेश), दादू साहेब जी (गुजरात) शामिल हैं। वेद भी पूर्ण परमेश्वर की इस लीला की गवाही देते हैं (ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 4 मन्त्र 6)। इस मंत्र में परमेश्वर कबीर जी को "तस्कर" अर्थात छिप कर कार्य करने वाला कहा है। नानक जी ने भी परमेश्वर कबीर साहेब की वास्तविक स्थिति से परिचित होने पर उन्हें "ठग" (गुरु ग्रंथ साहेब, राग सिरी, महला पहला, पृष्ठ 24) कहा है। क्योंकि वे अपने आप को छिपाकर एक सामान्य मनुष्य की लीला में इस लोक में थे।
नीरू नीमा का परिचय
नीरू और नीमा, यानी कबीर परमेश्वर के माता पिता वास्तव में ब्राह्मण थे जिन्हें अन्य ब्राह्मणों की ईर्ष्या के परिणामस्वरूप, मुसलमानों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तित कर दिया गया था। नीरू का नाम गौरीशंकर था तथा नीमा का नाम सरस्वती था। वे दोनों शिव जी के उपासक थे। वे परमात्मा चाहने वाली आत्माओं के बीच शिव पुराण का कथा वाचन किया करते थे। वे किसी भक्त द्वारा दिये जाने पर जरूरत के अनुसार रख लेते एवं बचे हुए धन का भंडारा कर दिया करते थे।
अन्य ब्राह्मणों को गौरी शंकर और सरस्वती द्वारा निस्वार्थ भाव से की जाने वाली कथा से ईर्ष्या होने लगी। गौरीशंकर किसी भी भक्तात्मा को धन के लालच में बहकाता नहीं था जिसके परिणामस्वरूप वह अनुयायियों में प्रिय बन गया। वहीं दूसरी ओर मुसलमानों को यह पता हो गया कि कोई भी हिन्दू ब्राह्मण उनके पक्ष में नहीं है जिसका उन्होंने फायदा उठाया और जबरदस्ती उनके घर में पानी छिड़क दिया एवं उन्हें भी पिला दिया। उन्हें धर्म परिवर्तित कर दिया। इस पर हिन्दू ब्राह्मणों ने कहा कि वे मुस्लिम हो चुके हैं एवं उनका हिंदुओ से अब कोई वास्ता नहीं रह सकता।
गौरीशंकर और सरस्वती के पास कोई रास्ता नहीं बचा। मुस्लिमों ने उनका नाम क्रमशः नीरू और नीमा रख दिया। अब न तो उनके पास कोई संचित राशि थी और न ही उनके पास आजीविका का कोई साधन बचा था क्योंकि दान आना अब बंद हो चुका था और वे मुस्लिम ठहराए जा चुके थे। ऐसी स्थिति में उन्होंने चरखा लेकर जुलाहे का कार्य प्रारंभ कर दिया। किन्तु अब भी वे मात्र जीविका निर्वाह का धन रखकर अन्य बचे धन का भंडारा कर देते थे। नीरू-नीमा का गंगा में स्नान करना अन्य ब्राह्मणों ने बंद कर दिया था क्योंकि उनके अनुसार वे मुस्लिम हो गए थे।
बालक कबीर को नीरू और नीमा अपने साथ ले गए
काशी में गंगा नदी की लहरों से लहरतारा तालाब जो कि एक बड़ा तालाब था, भर जाता था। वह सदा गंगा के पवित्र जल से भरा रहता था। तालाब में कमल पुष्प उगते थे। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को सन 1398 (विक्रमी संवत 1455) को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में (जोकि सूर्योदय से लगभग डेढ़ घण्टे पहले होता है) कबीर परमेश्वर सतलोक (ऋतधाम) से सशरीर आकर शिशु रूप में लहरतारा तालाब के ही कमल के पुष्प पर विराजमान हुए। इस घटना के प्रत्यक्ष दृष्टा स्वामी रामानन्द जी के शिष्य ऋषि अष्टानांद जी थे जो प्रतिदिन सुबह वहाँ साधना के लिए जाते थे। उन्होंने तेज प्रकाश उतरता देखा, उस तीव्र प्रकाश से सारा लहरतारा तालाब जगमग हो उठा एवं स्वयं ऋषि अष्टानांद की आंखें चौंधिया गईं। उन्होंने वह प्रकाश एक कोने में सिमटते देखा। उसी तालाब में नीरू और नीमा स्नान कर रहे थे और ये सोचकर दुखी हो रहे थे कि भगवान शिव ने उन्हें संतान नहीं दी।
तभी नीमा को कमल के फूल पर शिशु नज़र आया। उसने अपने पति को कहा कि देखो बच्चा डूब जाएगा। तब नीरू को लगा कि नीमा पागल हो गई है इसे अब पानी में भी बच्चे नज़र आने लगे है। अधिक विश्वास से कहने पर नीरू ने कमल की तरफ़ देखा तो उसे वहाँ शिशु रूप में कबीर परमात्मा नज़र आए। नीरू ने जाकर बच्चे को कमल के फूल सहित उठा लिया और नीमा को दे दिया। पहले समाज के डर से घर लाने के लिए मना करने के बाद जब कबीर परमात्मा ने शिशु रूप में कहा कि वे उन्हें घर ले जाए उन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा तब नीरू नीमा द्वारा कबीर परमात्मा को घर ले जाने की बात पर सहमत हुआ।
परमात्मा कबीर साहेब का पालन पोषण
जब वे शिशु रूप में कबीर परमात्मा को घर ले आए तब उस बच्चे को कहाँ से लाने की पूछने के बजाय नगर वालों ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि बच्चा कितना ज़्यादा विलक्षण है। सारी नगरी बच्चे को देखने के लिए उमड़ पड़ी।
बालक कबीर जी को दूध पिलाने की कोशिश नीमा ने की तो परमेश्वर ने दूध नहीं पिया। सर्व प्रयत्न करने पर भी नीमा तथा नीरू बालक को दूध पिलाने में असफल रहे। 25 दिनों तक कबीर साहेब ने कुछ भी ग्रहण नहीं किया। इस बात से नीरू और नीमा अत्यंत दुखी हुए। दुखी होकर नीरू-नीमा ने भगवान शिव से प्रार्थना की क्योंकि वे भगवान शिवजी के अनुयायी थे। तब शिवजी एक साधु का वेश बनाकर आये तथा नीमा ने अपनी सारी व्यथा शिवजी को सुनाई। शिवजी ने परमेश्वर कबीर साहेब को गोद में लिया, तब परमेश्वर कबीर ने शिवजी से संवाद किया एवं उन्हें प्रेरणा दी। तब कबीर जी के बताए अनुसार शिवजी ने नीरू को कुंवारी गाय लाने का आदेश दिया। कुंवारी गाय पर हाथ रखते ही गाय ने दूध देना प्रारंभ कर दिया और वह दूध कबीर साहेब ने पिया। परमात्मा की इस लीला का ज़िक्र वेदों में भी है। (ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 1 मन्त्र 9)
जब काजी मुल्ला कबीर साहेब के नामकरण के लिए आये तब उन्होंने कुरान खोली तो पुस्तक के सभी अक्षर कबीर-कबीर हो गए। उन्होंने पुनः प्रयत्न किया लेकिन तब भी सभी अक्षर कबीर में तब्दील हो गए। तब उनका नाम कबीर पड़ा। इस तरह कबीर परमात्मा ने अपना नाम स्वयं रखा।
कुछ समय बाद कुछ काजी कबीर साहेब की सुन्नत करने के उद्देश्य से आये तथा कबीर साहेब ने उन्हें एक लिंग के स्थान पर ढेरों लिंग दिखाए जिससे डर कर वे वापस लौट गए। परमात्मा की इस लीला का वर्णन पवित्र कबीर सागर में भी है।
20 से 22 जून 2024 तक तीन दिवसीय अखंड पाठ और भंडारे का आयोजन
इस वर्ष 20 जून से 22 जून 2024 तक, जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के सानिध्य में 627वें कबीर प्रकट दिवस के अवसर पर एक विशेष समागम का आयोजन किया जा रहा है। इस समागम पर आयोजित किए जाने वाले विशेष कार्यक्रम कुछ इस प्रकार है:
* निःशुल्क भंडारा: सभी आगंतुकों के लिए 20 से 22 जून 2024 तक निःशुल्क भंडारे का आयोजन होगा।
* निःशुल्क नाम दीक्षा: इस अद्वितीय अवसर पर संत रामपाल जी महाराज से निःशुल्क नाम दीक्षा प्राप्त की जा सकती हैं।
* 3 दिवसीय अखंड पाठ: 20 से 22 फरवरी 2024 तक, 3 दिनों तक अखंड पाठ का आयोजन होगा।
* रक्तदान शिविर, निशुल्क नेत्र व दांतो की जांच, दहेज मुक्त विवाह और आध्यात्मिक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया है।
* विशेष सत्संग प्रसारण: 22 जून 2024 को संत रामपाल जी महाराज के सत्संग का विशेष प्रसारण साधना टीवी चैनल पर सुबह 9:15 बजे (IST) से होगा।
* सोशल मीडिया प्रसारण: इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण निम्नलिखित सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों पर भी उपलब्ध होगा:
Facebook page:- Spiritual Leader Saint Rampal Ji
YouTube:- Sant Rampal Ji Maharaj
Twitter:- @SaintRampalJiM
आप सभी इस महान अवसर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करें और इस आध्यात्मिक आयोजन का लाभ उठाएं। वहीं इस कार्यक्रम में आने के लिए आप निम्न सतलोक आश्रम में आ सकते हैं:
1. सतलोक आश्रम धनाना धाम, सोनीपत, हरियाणा
2. सतलोक आश्रम मुंडका, दिल्ली
3. सतलोक आश्रम धूरी, पंजाब
4. सतलोक आश्रम खमाणो, पंजाब
5. सतलोक आश्रम सोजत, राजस्थान
6. सतलोक आश्रम शामली, उत्तर प्रदेश
7. सतलोक आश्रम कुरुक्षेत्र, हरियाणा
8. सतलोक आश्रम भिवानी, हरियाणा
9. सतलोक आश्रम बैतूल, मध्य प्रदेश
10. सतलोक आश्रम इंदौर, मध्य प्रदेश
11. सतलोक आश्रम धनुषा, नेपाल
संत रामपाल जी महाराज जी से निःशुल्क नाम दीक्षा लेने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें ⬇️
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